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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

नव वर्ष की बधाई


हमारे एक मित्र
हैं बड़े विचित्र
एक जनवरी को हमसे बोले -
"
चक्र" जी
नव वर्ष की बधाई !
हमने कहा
बड़े अजीब हो,
बिना सोचे समझे ही बधाई
आपको
देने मै ज़रा भी शर्म नहीं आयी ?
अरे,
नव वर्ष जब भी आता है
केवल
वर्ष ही तो नया रहता है
लेकिन
समस्याएँ पुरानी दोहराता है !
समस्याओं की श्रेणी में
प्रथम क्रमांक
रोटी का आता है
विश्वाश करो,
एक दिन तो ऐसा आएगा
जब
मोनो एक्टिंग करके
कोरी कल्पना से पेट भरना होगा,
तब
हम अपने बच्चों को बताएंगे
कि
रोटी एक इतिहास है
और
उसकी कहानियां सुनाएंगे !
यह सुनकर
हमारे बच्चे भी
रोटी के भूतकालीन अस्तित्व पर
विशवास नहीं कर पाएंगे !
मेरे भाई,
बधाई का क्या है -
नव वर्ष की
सिर्फ निष्ठा बदल जाती है
और
मौक़ा देखकर
उसकी भी नीयत बदल जाती है !
जिस दिन
महंगाई कम हो जाएगी
उस दिन मैं
घी के दिये जलाऊंगा
और
सच मानो
आपको नव वर्ष की बधाई देने अवश्य आऊँगा |

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

सान्निध्य: समय का पहिया चलता जाये

सान्निध्य: समय का पहिया चलता जाये: जीवन का संगीत सुनाये समय का पहिया चलता जाये। उल्‍लासों से भरे हुए मन कुछ करने को उत्‍साहित मन उच्‍छवासों को कोने कर कुछ पाने क...

बुधवार, 26 सितंबर 2012

सान्निध्‍य दर्पण: 'आकुल'

सान्निध्‍य दर्पण: 'आकुल': जब से मन की नाव चली। अँगना छूटा, घर गलियाँ भी।। पनघट कहाँ, कहाँ अठखेली, जमघट से बाजार पटे। बटवृक्षों की थाती इतनी, रिश्‍...

रविवार, 23 सितंबर 2012

सान्‍नि‍ध्‍य सेतु: हाड़ौती के शतायुपार कवि डा0 भ्रमर को उनकी पुस्‍तक ...

सान्‍नि‍ध्‍य सेतु: हाड़ौती के शतायुपार कवि डा0 भ्रमर को उनकी पुस्‍तक ...: सम्‍मानित करते साहित्‍यकार बाये से दायें- हिमांशु बवंडर, डा0 नलिन, एहतेशाम अख्‍तर पाशा, शरद जायसवाल, डा0 रघुनाथ मिश्र, डा0 भ्रमर के पुत्...

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

कोयला भी हैं खाने लगे



बेईमानी की आंधी चली इतनी जोर से, 

कि ईमान के पर्वत भी डगमगाने लगे .

दंभ भरते थे, जो अपने पाक-साफ़ होने का, 
वो कदम भी बढ़कर कोठों तक आने लगे . 

चारों ओ़र से चुप-चाप चोरी में जो लगे रहे, 
देखो आज वही सब, चोर-चोर चिल्लाने लगे. 

जन्नत समझ कर जिसे, गए थे लोग वहाँ, 
वहाँ जाकर, वही मुकाम उन्हें  कैदखाने लगे

पेट की भूख इतनी बढ़ गई अब 'शैलेश'
देखो, लोग आज कोयला भी हैं खाने लगे. 
                            - कवि शैलेश शुक्ला  

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

सान्निध्य: जय गणेश देवा

सान्निध्य: जय गणेश देवा: कुण्‍डलियाँ (1) श्रीगणेश , हे अष्टविनायक , शैलसुता के नंदन। प्रथम पूज्य, गणपति, गणनायक करूँ आरती वंदन। करूँ आरती वंदन बुद्धि...

सोमवार, 17 सितंबर 2012

सान्निध्‍य दर्पण: पूर्णिमा वर्मन

सान्निध्‍य दर्पण: पूर्णिमा वर्मन: यादों की घनी छाँह से पर्वत के देवदार बचपन के एक गाँव से पर्वत के देवदार गरमी की तंग साँस में राहत बने हुए भीगे हुए तुषार से पर्वत के द...

बुधवार, 12 सितंबर 2012

रविवार, 9 सितंबर 2012

सान्निध्य: अपनी हिन्‍दी

सान्निध्य: अपनी हिन्‍दी: कुण्‍डलियाँ (1) हिन्‍दी के उन्‍नयन को, बने एक सहमति। नुक्‍कड़ नाटक, हस्‍ताक्षर अभियान चले द्रुतगति। अभियान चले द...

सान्निध्य: हिन्‍दी को करें बेहिसाब प्‍यार

सान्निध्य: हिन्‍दी को करें बेहिसाब प्‍यार: हिन्‍दी को करें हम अब, बेहिसाब प्‍यार। मातृ भाषा, राष्‍ट्रभाषा का गौरव अपार। सीखें, बोलें इसकी बतायें विशेषता। भाषाएँ दिखाद...

शनिवार, 8 सितंबर 2012

सान्निध्य: साक्षरता

सान्निध्य: साक्षरता:   कुण्‍डलियाँ (1)  बच्‍चे - बूढ़े-प्रोढ़-नार-नर, सब हों अक्षरज्ञानी। कैसे समझेंगे दुनिया को, अनपढ़ और अज्ञानी। अनपढ़ और अज्ञान...

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

सान्निध्य: हिन्‍दी के लिए

सान्निध्य: हिन्‍दी के लिए: हिन्‍दी के लिए समग्र हों, अब दृढ़ निश्‍चयी। बहुत रहे संघर्षरत अब पर्व मनायें। दूजी सीढ़ी पर हैं गौरव गाथा गाये। इससे...

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

सान्निध्य: शिक्षक

सान्निध्य: शिक्षक:   जो शिक्षित करता हम उसको शिक्षक कह सकते हैं। जो दीक्षित करता हम उसको शिक्षक कह सकते है। दिशा दिखाये, दे दृष्‍टांत, आगाह करे,...

सोमवार, 3 सितंबर 2012

अबनीश सिंह चौहान

सान्निध्‍य दर्पण: अबनीश सिंह चौहान: युवा नवगीतकार अवनीश सिंह चौहान को प्रथम कविताकोश 2011 पुरस्‍कार नयी चलन के इस कैफे में प्रथम कविताकोश के लिए प्रशस्ति पत्र औ...

शनिवार, 25 अगस्त 2012

सान्‍नि‍ध्‍य सेतु: साहित्‍यकार-5 में रघुनाथ मिश्र और ‘आकुल’

सान्‍नि‍ध्‍य सेतु: साहित्‍यकार-5 में रघुनाथ मिश्र और ‘आकुल’: निरुपमा प्रकाशन मेरठ की ‘साहित्‍यकार’ प्रकाशन शृंखला की पाँचवी कड़ी में पाँच कवियों में कोटा के वरिष्‍ठ साहित्‍यकार और जनकवि विद्या वाचस्‍प...

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

“कोयला भी हैं खाने लगे”

कोयला भी हैं खाने लगे

बेईमानी की आंधी चली इतनी जोर से,
कि ईमान के पर्वत भी डगमगाने लगे .

दंभ भरते थे, जो अपने पाक-साफ़ होने का,
वो कदम भी बढ़कर कोठों तक आने लगे .

चारों ओ़र से चुप-चाप चोरी में जो लगे रहे,
देखो आज वही सब, चोर-चोर चिल्लाने लगे.

जन्नत समझ कर जिसे, गए थे लोग वहाँ,
वहाँ जाकर, वही मुकाम उन्हें  कैदखाने लगे

पेट की भूख इतनी बढ़ गई अब 'शैलेश'
देखो, लोग आज कोयला भी हैं खाने लगे.
  

"कुछ कर लो"


"चाँद को निहारने की बात"


"कोयला भी हैं खाने लगे"


रविवार, 19 अगस्त 2012

भाईचारा बढ़े

सान्निध्य: भाईचारा बढ़े: भाईचारा बढ़े संग हम सब त्‍योहार मनायें। एक ही घर परिवार शहर के हैं सबको अपनायें। क्यूँ आतंक घृणा बर्ब...

बुधवार, 15 अगस्त 2012

आज जो भी है वतन

सान्निध्य: आज जो भी है वतन: 15 अगस्‍त 2012 पर सभी को नमन शुभकमानायें वंदे मात रम् इस पर्व पर हुतात्‍माओं को श्रद्धांजलि  जिनके अथक परिश्रम से मिली इस...

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

स्वतंत्रता दिवस


मैंने मित्र से पूछा

क्या बात है

हमसे छुप रहे हो

बहुत खुश दिख रहे हो?

मित्र बोला-

हाँ

मैं आज बहुत खुश हूँ

इसलिए

देशभक्ति के गीत गा रहा हूँ

और

स्वतंत्रता दिवस मना रहा हूँ

मैंने कहा

लेकिन

आज तो स्वतंत्रता दिवस नहीं है!

मित्र बोला

यह सही है

कि

आज स्वतंत्रता दिवस नहीं है

लेकिन-

मुझे इस बात का गम नहीं है

क्योंकि

पत्नी का मायके जाना भी

किसी

स्वतंत्रता दिवस से कम नहीं है।

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012



कवि श्री गाफिल स्वामी जी को "निरूपमा प्रकाशन" से प्रकाशित उनके काव्य संग्रह
"जय हो भ्रष्टाचार की"
प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई।



पुस्तक समीक्षा

वर्तमान परिवेश में "भ्रष्टाचार" एक ऐसा मुद्दा है जो ढलान पर अनियंत्रित वाहन की तरह गति पकड‌ चुका है। विषय विशेष पर इतना अधिक लिखना विरले लोग ही कर पाते हैं। इस पुस्तक के प्रकाशन से कवि ने सदियों तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। किसी कविता में कुछ अलग हटकर लिखा हो तो उस विशेष कविता की चर्चा अनिवार्य हो जाती है। लेकिन इस पुस्तक में प्रत्येक कविता विशेष होने के कारण किसी खण्डकाव्य का अर्क प्रतीत होती है। भ्रष्टाचार पर अंकुश असंभव सा लगता है। लेकिन मैं यह बात दावे से कह सकता हूँ कि कोई भी भ्रष्टाचारी इस पुस्तक को पढने के बाद अपने जीवन में सुधार की संभावनाएं अवश्य ही तलाशेगा।
वरिष्ठ कवि श्री गाफिल स्वामी जी एक अच्छी सोच और सार्थक प्रयास के साथ निर्विवाद रूप से बधाई के पात्र हैं। उनकी यह पुस्तक निःसंदेह पठनीय एवं संकलन योग्य है।


कवि सुधीर गुप्ता "चक्र"

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

मिलने का मौसम है

मिलने का मौसम है नजर मिलाकर मिल।
कल किसने देखा है अब ही आकर मिल॥

दुनियां का हर दर्द छुपा है इस दिल में,
तू भी अपना दर्द साथ में लाकर मिल॥

मंदिर मस्जिद गिरजाघर में क्या रक्खा,
माँ के चरणों में नित शीश झुकाकर मिल॥

सुखियों से तो मिलते हैं सब लोग यहाँ,
दुखियों को भी दिल से कभी लगाकर मिल॥

नफरत और क्रोध की ज्वाला में मत जल,
मन में दीप प्यार के सदा जलाकर मिल॥

जीते जी फुर्सत न कभी होगी तेरी,
हरि सुमिरन में भी कुछ वक्त बिताकर मिल॥

दुनिया दीवानी होगी तेरी 'गाफिल',
मन के सारे भेद-भाव बिसरा कर मिल॥

झूठ का है बोल-बाला

झूठ का है बोल-बाला कलयुगी संसार में।
नाव सच की डगमगाती चल रही मझधार में॥

सभ्यता सद्‌ आचरण की उड़ रही हैं धज्जियां,
आदमीयत अब नजर आती नहीं व्यवहार में॥

पेट की खातिर कहें या शौक की खातिर कहें,
हो रहा है जिस्म का सौदा सरे बाजार में॥

प्यार पैसे की हवस में आदमी अंधा हुआ,
खून के रिश्ते कलंकित हो रहे हैं प्यार में॥

सोच दूषित भाव दूषित कर्म दूषित हो गये,
आदमी ने खत्म कर दी जिन्दगी बेकार में॥

है जमाना आज कल चालाक औ खुदगर्ज का,
फिर भी हम 'गाफिल' रहे बस यार के दीदार में॥

सदा नेह बरसाया माँ ने

अपना दूध पिलाकर मेरा, तन-मन पुष्ट बनाया माँ ने।
जब भी मैं रोया चिल्लाया, छाती से चिपकाया माँ ने॥

घुटुअन चला गिरा पुचकारा, चोट लगी सहलाया माँ ने।
धीरे-धीरे बडा‌ हुआ मैं, उँगली पकड चलाया माँ ने॥

भूखी रही बाद में खाया, पहले मुझे खिलाया माँ ने।
गीले में सोई महतारी, सूखे मुझे सुलाया माँ ने॥

नजर न लगे किसी की मुझको, टीका रोज लगाया माँ ने।
घर से बाहर जब भी निकला, सिर पर हाथ फिराया माँ ने।

पढ‌ने गया पाठशाला में, ले-ले कर्ज पढा‌या माँ ने।
पास हुआ तो खुशी हुई माँ, फेल हुआ समझाया माँ ने॥

कभी झूठ बोला तो मारा, केवल सच सिखलाया माँ ने।
शादी योग्य हुआ की शादी, इंसा मुझे बनाया माँ ने ॥

सास-बहू में तू-तू मैं-मैं हुई, हमेशा छुपाया माँ ने।
गाली खायी अश्क बहाए, फिर भी नहीं बताया माँ ने।

मैं तो कर्ज चुका ना पाया, मेरा कर्ज चुकाया माँ ने।
मरते दम तक दी आशीषें माँ ने, सदा नेह बरसाया माँ ने॥

हम

घर में आटा दाल नहीं है।
फिर भी मन कंगाल नहीं है॥

माँ माटी को नमन करें नित,
हम जैसा तो लाल नहीं है॥

हम मेहनत-इज्जत की खाते,
हम पर जुडता माल नहीं है॥

हम हैं सच्चे पथ के राही,
अपनी टेढी‌ चाल नहीं है।

हम पर दर्दो का है पहरा,
मद माया का जाल नहीं है॥

हम हैं प्रश्न हम ही हैं उत्तर,
हमसे बडा‌ सवाल नहीं है॥

सेवा और प्रेम में 'गाफिल',
बद है पर बदहाल नहीं है॥

मुक्तक

(१)
जो शहीद हो गये वतन पर वो कुछ ही अवतार हुये।
उनमें राजगुरू ऊधम और भगतसिंह सरदार हुये॥
निशदिन याद करें हम उनको नित उठ उनको करें नमन॥
जिनके कारण आजादी के स्वप्न सभी साकार हुये॥

(२)
वीर शहीदों की कुर्बानी भूले सुख पाने वाले।
अब तो केवल मौज ले रहे सत्ता में आने वाले॥
भ्रष्टाचार और घोटाले भारत की पहिचान बने,
देश बेच कर खा जायेंगे दुष्ट भ्रष्ट खाने वाले॥

(३)
धर्म कर्म और संस्कार अब नजर न आते।
भोग विलासी लोग हुये सब मजे उडा‌ते॥
मिट्टी में मिल गईं मान मर्यादायें अब,
पैसे प्यार में 'गाफिल' जीवन भर भरमाते॥

मुक्तक

जिन्दगी और मौत का सच जान लेगा जो।
वक्त और इंसान को पहचान लेगा जो॥
जिन्दगी जीयेगा वो ही शान से 'गाफिल',
मौत से मिलने की मन में ठान लेगा जो॥


चाह कर भी जिन्दगी से मिल न पाये।
वक्त के भी साथ में हम चल न पाये॥
हमने जीवन भर छला है हर किसी को,
मौत से हारे उसे हम छल न पाये॥


हम पुजारी सत्य के है कर्म से नाता।
प्रेम और सौहार्द्र का जीना हमें भाता॥
वक्त से कह दो कि दे वो साथ सच का,
झूठ से मिलने कभी भी सच नहीं जाता॥


मौत से डर कर न जी वो एक दिन ही आयेगी।
जिन्दगी के सफर का संग आईना भी लायेगी॥
लाख करना मिन्नतें तेरी सुनेगी वो नहीं,
तू न जाना चाहेगा तो खींच कर ले जायेगी॥

मुक्तक

दिल में दर्द छुपाया हमने चेहरे पर मुस्कान रखी।
प्रथम मिलन में भी जीवन की हमने हर पहचान रखी॥
पुनर्मिलन की आस लिये हम मिले सभी से जीवन में,
विमुख हुये तो भी मर्यादा आन-बान और शान रखी॥


प्यार के हर रंग को स्वीकार कर देखो।
रंग नफरत का सदा दुत्कार कर देखो॥
जिन्दगी भर रंग की बरसात होगी,
प्यार से यदि प्यार का रंग डार कर देखो॥



जिन्दगी जीयो हमेशा मुस्कुराकर।
दर्द को भी देख लो अपना बनाकर॥
प्रेम से बढ़कर नहीं कुछ और जग में,
तोडना मत दिल किसी का दिल लगाकर॥

मंगलवार, 27 मार्च 2012

सदी के हत्यारे

नेता

अमानवीय कृत्यों की

पराकाष्ठा हो तुम

तुम्हारा

छल-छद्म देखकर

भेडियों ने आत्महत्या कर ली

तुम

बोलते नहीं

आग उगलते हो

तुम्हारा

मौन रहकर मंथन करना

निश्चित

विनाश का संकेत है

तुम्हारा

कौवे सा सयानापन

सबूत है

तुम्हारे काने होने का

बेवकूफ हैं वे

जो

करते हैं वर्ष भर इंतजार

नाग-पंचमी पर दूध पिलाने का

इसके अलावा भी

तीन सौ चौंसठ दिनों का

विकल्प है उनके पास

सच तो यह है

कि आज

गलतफहमी में जीता है समाज

क्योंकि

जो शांति के उपासक घोषित हैं

वे ही

इस सदी के हत्यारे हैं।

उम्मीदें क्यों ?

क्यों बिलोता हूँ कीचड़

शायद इसलिए

दूध की तरह

उफान न आए

क्यों लिखता हूँ

रेत पर अपने छंद

शायद इसलिए

कोई इतिहास बन जाए

क्यों देखता हूँ आईना

शायद इसलिए

चेहरे पर अपने

भरोसा नहीं

क्यों मौन हूँ

शायद इसलिए

वाणी चुर (चुराना) न जाए

क्यों रहता हूँ फटेहाल

सुदामा की तरह

शायद इसलिए

कृष्ण, मुझे भी अपनाएँ

क्यों है

सूरज से दोस्ती की लालसा

शायद इसलिए

रोशनी कहीं

अँधेरों में न सिमट जाए

क्यों लगाए हैं कैक्टस

शायद इसलिए

यमराज के आने का डर है

क्यों डर है रिश्तों से

शायद इसलिए

खून अपना

तुरूप की चाल न हो

यह सारी उम्मीदें क्यों

शायद इसलिए

असंभव

संभव हो जाए।

चटकनी

दरवाजे

हर रोज

अनगिनत बार

चौखट से गले मिलते हैं

साक्षी हैं कब्जे

इस बात के

जो

सौगंध खा चुके हैं

दोनों को मिलाते रहने की

जंग लगने पर

कमजोर हो जाते हैं कब्जे

और

चर्र-चर्र ......

आवाज करते हुए

कराहते हैं दर्द से

फिर भी

निःस्वार्थ भाव से

दोनों को मिलाते रहने का क्रम

जारी रखते हैं

जलते हैं तो

गिट्टक और स्टॉपर

मिलन के अवरोधक बनकर

कहने को अपने हैं

सहयोग करती है

हवा

अपनी सामर्थ्य के अनुसार

ललकारती भी है

गिट्टक और स्टॉपर को

और

चौखट से दरवाजे का

मिलन हो न हो

जारी रखती है प्रयास

उससे भी महान है

चटकनी

जो

ढूँढती है मौका

दोनों के प्रणय मिलन का

और

खुद बंद होकर

घंटों मिला देती है दोनों को।