अपना दूध पिलाकर मेरा, तन-मन पुष्ट बनाया माँ ने।
जब भी मैं रोया चिल्लाया, छाती से चिपकाया माँ ने॥
घुटुअन चला गिरा पुचकारा, चोट लगी सहलाया माँ ने।
धीरे-धीरे बडा हुआ मैं, उँगली पकड चलाया माँ ने॥
भूखी रही बाद में खाया, पहले मुझे खिलाया माँ ने।
गीले में सोई महतारी, सूखे मुझे सुलाया माँ ने॥
नजर न लगे किसी की मुझको, टीका रोज लगाया माँ ने।
घर से बाहर जब भी निकला, सिर पर हाथ फिराया माँ ने।
पढने गया पाठशाला में, ले-ले कर्ज पढाया माँ ने।
पास हुआ तो खुशी हुई माँ, फेल हुआ समझाया माँ ने॥
कभी झूठ बोला तो मारा, केवल सच सिखलाया माँ ने।
शादी योग्य हुआ की शादी, इंसा मुझे बनाया माँ ने ॥
सास-बहू में तू-तू मैं-मैं हुई, हमेशा छुपाया माँ ने।
गाली खायी अश्क बहाए, फिर भी नहीं बताया माँ ने।
मैं तो कर्ज चुका ना पाया, मेरा कर्ज चुकाया माँ ने।
मरते दम तक दी आशीषें माँ ने, सदा नेह बरसाया माँ ने॥
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गुरुवार, 19 अप्रैल 2012
सदा नेह बरसाया माँ ने
सोमवार, 31 जनवरी 2011
माँ की सेवा
हमने अपनी माँ को देखा,
फिर मां में ममता को देखा।
ममता में भी मां को देखा,
बार बार बस मां को देखा।।
देखा-देखी के इस युग में,
हमने केवल मां को देखा।
माँ ने तो हमको भी देखा,
और सारे जग को भी देखा।।
जब मैं छोटा, माँ-माँ होती,
मैं रोता था माँ ना रोती।
मुझे खिला पिला कर भी माँ,
कभी-कभी भूखी भी सोती।।
आज उलट है उसका यारों,
अपनी मां अब वृद्ध हो गई।
बहू-बेटियां नाती-पोते,
घर की फौज समृद्ध हो गई।।
माँ की खटिया घर के बाहर,
या छप्पर के नीचे आई।
रोटी की तो बात अलग है,
पानी को भी देत दुहाई।।
बुढ़िया-बुढ़िया कहकर घर क्या,
सारा गांव बुलाता है।
बुढ़िया रोये या चिल्लाये,
बेटा भी कतराता है।।
बुढ़िया होकर भी माँ-माँ है,
फिर भी आंसू पी रह जाती।
घर में अगर कोई झगड़ा हो,
पास बुला सबको समझाती।।
माँ की हालत ऐसी भैया,
मेरी हो या तेरी मैया।
माँ का दुःख बस मां ही जाने,
या फिर जाने सृष्टि रचैया।।
माँ की सेवा परम धर्म है,
ये हैं संतों की बानी।
जीते जी कर माँ की सेवा,
माँ मरने के बाद न आनी।।
जो माँ के चरणों में अर्पण,
तन-मन धन कर जायेगा।
जीवन भर सुख पायेगा वो,
और स्वर्ग में जायेगा।।
फिर मां में ममता को देखा।
ममता में भी मां को देखा,
बार बार बस मां को देखा।।
देखा-देखी के इस युग में,
हमने केवल मां को देखा।
माँ ने तो हमको भी देखा,
और सारे जग को भी देखा।।
जब मैं छोटा, माँ-माँ होती,
मैं रोता था माँ ना रोती।
मुझे खिला पिला कर भी माँ,
कभी-कभी भूखी भी सोती।।
आज उलट है उसका यारों,
अपनी मां अब वृद्ध हो गई।
बहू-बेटियां नाती-पोते,
घर की फौज समृद्ध हो गई।।
माँ की खटिया घर के बाहर,
या छप्पर के नीचे आई।
रोटी की तो बात अलग है,
पानी को भी देत दुहाई।।
बुढ़िया-बुढ़िया कहकर घर क्या,
सारा गांव बुलाता है।
बुढ़िया रोये या चिल्लाये,
बेटा भी कतराता है।।
बुढ़िया होकर भी माँ-माँ है,
फिर भी आंसू पी रह जाती।
घर में अगर कोई झगड़ा हो,
पास बुला सबको समझाती।।
माँ की हालत ऐसी भैया,
मेरी हो या तेरी मैया।
माँ का दुःख बस मां ही जाने,
या फिर जाने सृष्टि रचैया।।
माँ की सेवा परम धर्म है,
ये हैं संतों की बानी।
जीते जी कर माँ की सेवा,
माँ मरने के बाद न आनी।।
जो माँ के चरणों में अर्पण,
तन-मन धन कर जायेगा।
जीवन भर सुख पायेगा वो,
और स्वर्ग में जायेगा।।
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