बुधवार, 14 मार्च 2012
सान्निध्य: शैफ़ाली
सान्निध्य: शैफ़ाली: नाम है शैफाली जाने हयात का घर में है दरख्त है पारिजात का। फ़स्ले बहाराँ में वो रूठे रहे और मौसिम में सदा हँसते रहे दरख्त भी रूठा रहा इस...
बुधवार, 7 मार्च 2012
सान्निध्य: रंग भंग चंग का त्योहार है होली
सान्निध्य: रंग भंग चंग का त्योहार है होली: रंग भंग चंग का त्योहार है होली। रँगता गया जो इसमें होली उसकी तो हो ली।। लेके चंग टोली झूमो नाचो व गाओ। जिससे मिलो तुम रंग लगा के अपना ब...
मंगलवार, 6 मार्च 2012
समाज
जब भी
होली का दिन आता है
वह भिखारी
बडा खुश हो जाता है
क्योंकि
उसी दिन तो वह
फटे-पुराने कपडे पहनकर
समाज में
गले मिल पाता है।
व्यवहार
होली पर हमें
उनका व्यवहार
बहुत भाता है
क्योंकि
हमारा खर्चा बच जाता है
और
रंग डालने के पहले ही
उनका चेहरा
गुस्से से लाल हो जाता है।
सोमवार, 5 मार्च 2012
सान्निध्य: होली पर कुण्डलियाँ
सान्निध्य: होली पर कुण्डलियाँ: होली की मस्ती में हो अबीर गुलाल का रंग। पानी में घुल कर रंग-रंग हो जाए ना बदरंग। जाए ना बदरंग रंग बेरंग लगे होली। काले दिल वालों की काली ह...
मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012
तुम सृजन करो
तुम सृजन करो मैं हरित प्रीत शृंगार सजाऊँगा।
वसुन्धरा को धानी चूनर भी पहनाऊँगा।
देखे होंगे स्वप्न यथार्थ में जीने का है समय,
ग्रामोत्थान और हरित क्रांति की अलख जगाऊँगा।।
बढ़ते क़दम शहर की ओर रोकूँगा जड़वत हो।
ग्राम्य विकास का युवकों में संज्ञान अनवरत हो।
नई नई तकनीक उन्न्त कृषि कक्षायें हों।
साधन संसाधन जाने की कार्यशालायें हों।
कहाँ कसर है ग्राम्य चेतना शिविर लगाऊँगा।।
गोबर गेस, सौर ऊर्जा का हो समुचित उपयोग।
साझा चूल्हा, साझा खेती पर हों नए प्रयोग।
पर्यावरण सुरक्षा, सघन वन, पशुधन संवर्द्धन हो।
पंचायत के निर्णय मान्य हों, न कोई भूखा जन हो।
श्रम का हो सम्मान मैं ऐसी हवा चलाऊँगा।।
कृषिप्रधान है देश कृषि पर ध्यान रहे हरदम।
वर्षा पर नों निर्भर जल संग्रहण हो न कम।
उन्नत बीज खाद मिले बाजार यहीं विकसित हों।
चौपाल सजें आधुनिक कृषि पर चर्चायें भी नित हों।
वसुन्धरा को धानी चूनर भी पहनाऊँगा।
देखे होंगे स्वप्न यथार्थ में जीने का है समय,
ग्रामोत्थान और हरित क्रांति की अलख जगाऊँगा।।
बढ़ते क़दम शहर की ओर रोकूँगा जड़वत हो।
ग्राम्य विकास का युवकों में संज्ञान अनवरत हो।
नई नई तकनीक उन्न्त कृषि कक्षायें हों।
साधन संसाधन जाने की कार्यशालायें हों।
कहाँ कसर है ग्राम्य चेतना शिविर लगाऊँगा।।
गोबर गेस, सौर ऊर्जा का हो समुचित उपयोग।
साझा चूल्हा, साझा खेती पर हों नए प्रयोग।
पर्यावरण सुरक्षा, सघन वन, पशुधन संवर्द्धन हो।
पंचायत के निर्णय मान्य हों, न कोई भूखा जन हो।
श्रम का हो सम्मान मैं ऐसी हवा चलाऊँगा।।
कृषिप्रधान है देश कृषि पर ध्यान रहे हरदम।
वर्षा पर नों निर्भर जल संग्रहण हो न कम।
उन्नत बीज खाद मिले बाजार यहीं विकसित हों।
चौपाल सजें आधुनिक कृषि पर चर्चायें भी नित हों।
रविवार, 5 फ़रवरी 2012
सान्निध्य: दूल्हा राग बसंत
सान्निध्य: दूल्हा राग बसंत: सभी राग बाराती हैं बस, दूल्हा राग बसंत। लोक गीत देहाती हैं सब, आल्हा राग बसंत।। हरसायेगी पवन बसंती सरदी का अब अंत। सूरज ने भी बदला है पथ ...
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