रविवार, 19 अगस्त 2012
भाईचारा बढ़े
सान्निध्य: भाईचारा बढ़े: भाईचारा बढ़े संग हम सब त्योहार मनायें। एक ही घर परिवार शहर के हैं सबको अपनायें। क्यूँ आतंक घृणा बर्ब...
बुधवार, 15 अगस्त 2012
आज जो भी है वतन
सान्निध्य: आज जो भी है वतन: 15 अगस्त 2012 पर सभी को नमन शुभकमानायें वंदे मात रम् इस पर्व पर हुतात्माओं को श्रद्धांजलि जिनके अथक परिश्रम से मिली इस...
मंगलवार, 14 अगस्त 2012
स्वतंत्रता दिवस
मैंने मित्र से पूछा
क्या बात है
हमसे छुप रहे हो
बहुत खुश दिख रहे हो?
मित्र बोला-
हाँ
मैं आज बहुत खुश हूँ
इसलिए
देशभक्ति के गीत गा रहा हूँ
और
स्वतंत्रता दिवस मना रहा हूँ
मैंने कहा
लेकिन
आज तो स्वतंत्रता दिवस नहीं है!
मित्र बोला
यह सही है
कि
आज स्वतंत्रता दिवस नहीं है
लेकिन-
मुझे इस बात का गम नहीं है
क्योंकि
पत्नी का मायके जाना भी
किसी
स्वतंत्रता दिवस से कम नहीं है।
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012
कवि श्री गाफिल स्वामी जी को "निरूपमा प्रकाशन" से प्रकाशित उनके
काव्य संग्रह
"जय हो भ्रष्टाचार की"
प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई।
पुस्तक समीक्षा
वर्तमान परिवेश में
"भ्रष्टाचार" एक ऐसा मुद्दा है जो ढलान पर अनियंत्रित वाहन की तरह गति
पकड चुका है। विषय विशेष पर इतना अधिक लिखना विरले लोग ही कर पाते हैं। इस पुस्तक
के प्रकाशन से कवि ने सदियों तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। किसी कविता में कुछ
अलग हटकर लिखा हो तो उस विशेष कविता की चर्चा अनिवार्य हो जाती है। लेकिन इस
पुस्तक में प्रत्येक कविता विशेष होने के कारण किसी खण्डकाव्य का अर्क प्रतीत होती
है। भ्रष्टाचार पर अंकुश असंभव सा लगता है। लेकिन मैं यह बात दावे से कह सकता हूँ
कि कोई भी भ्रष्टाचारी इस पुस्तक को पढने के बाद अपने जीवन में सुधार की संभावनाएं
अवश्य ही तलाशेगा।
वरिष्ठ कवि श्री गाफिल स्वामी जी एक
अच्छी सोच और सार्थक प्रयास के साथ निर्विवाद रूप से बधाई के पात्र हैं। उनकी यह
पुस्तक निःसंदेह पठनीय एवं संकलन योग्य है।
कवि सुधीर गुप्ता "चक्र"
गुरुवार, 19 अप्रैल 2012
मिलने का मौसम है
मिलने का मौसम है नजर मिलाकर मिल।
कल किसने देखा है अब ही आकर मिल॥
दुनियां का हर दर्द छुपा है इस दिल में,
तू भी अपना दर्द साथ में लाकर मिल॥
मंदिर मस्जिद गिरजाघर में क्या रक्खा,
माँ के चरणों में नित शीश झुकाकर मिल॥
सुखियों से तो मिलते हैं सब लोग यहाँ,
दुखियों को भी दिल से कभी लगाकर मिल॥
नफरत और क्रोध की ज्वाला में मत जल,
मन में दीप प्यार के सदा जलाकर मिल॥
जीते जी फुर्सत न कभी होगी तेरी,
हरि सुमिरन में भी कुछ वक्त बिताकर मिल॥
दुनिया दीवानी होगी तेरी 'गाफिल',
मन के सारे भेद-भाव बिसरा कर मिल॥
कल किसने देखा है अब ही आकर मिल॥
दुनियां का हर दर्द छुपा है इस दिल में,
तू भी अपना दर्द साथ में लाकर मिल॥
मंदिर मस्जिद गिरजाघर में क्या रक्खा,
माँ के चरणों में नित शीश झुकाकर मिल॥
सुखियों से तो मिलते हैं सब लोग यहाँ,
दुखियों को भी दिल से कभी लगाकर मिल॥
नफरत और क्रोध की ज्वाला में मत जल,
मन में दीप प्यार के सदा जलाकर मिल॥
जीते जी फुर्सत न कभी होगी तेरी,
हरि सुमिरन में भी कुछ वक्त बिताकर मिल॥
दुनिया दीवानी होगी तेरी 'गाफिल',
मन के सारे भेद-भाव बिसरा कर मिल॥
झूठ का है बोल-बाला
झूठ का है बोल-बाला कलयुगी संसार में।
नाव सच की डगमगाती चल रही मझधार में॥
सभ्यता सद् आचरण की उड़ रही हैं धज्जियां,
आदमीयत अब नजर आती नहीं व्यवहार में॥
पेट की खातिर कहें या शौक की खातिर कहें,
हो रहा है जिस्म का सौदा सरे बाजार में॥
प्यार पैसे की हवस में आदमी अंधा हुआ,
खून के रिश्ते कलंकित हो रहे हैं प्यार में॥
सोच दूषित भाव दूषित कर्म दूषित हो गये,
आदमी ने खत्म कर दी जिन्दगी बेकार में॥
है जमाना आज कल चालाक औ खुदगर्ज का,
फिर भी हम 'गाफिल' रहे बस यार के दीदार में॥
नाव सच की डगमगाती चल रही मझधार में॥
सभ्यता सद् आचरण की उड़ रही हैं धज्जियां,
आदमीयत अब नजर आती नहीं व्यवहार में॥
पेट की खातिर कहें या शौक की खातिर कहें,
हो रहा है जिस्म का सौदा सरे बाजार में॥
प्यार पैसे की हवस में आदमी अंधा हुआ,
खून के रिश्ते कलंकित हो रहे हैं प्यार में॥
सोच दूषित भाव दूषित कर्म दूषित हो गये,
आदमी ने खत्म कर दी जिन्दगी बेकार में॥
है जमाना आज कल चालाक औ खुदगर्ज का,
फिर भी हम 'गाफिल' रहे बस यार के दीदार में॥
सदा नेह बरसाया माँ ने
अपना दूध पिलाकर मेरा, तन-मन पुष्ट बनाया माँ ने।
जब भी मैं रोया चिल्लाया, छाती से चिपकाया माँ ने॥
घुटुअन चला गिरा पुचकारा, चोट लगी सहलाया माँ ने।
धीरे-धीरे बडा हुआ मैं, उँगली पकड चलाया माँ ने॥
भूखी रही बाद में खाया, पहले मुझे खिलाया माँ ने।
गीले में सोई महतारी, सूखे मुझे सुलाया माँ ने॥
नजर न लगे किसी की मुझको, टीका रोज लगाया माँ ने।
घर से बाहर जब भी निकला, सिर पर हाथ फिराया माँ ने।
पढने गया पाठशाला में, ले-ले कर्ज पढाया माँ ने।
पास हुआ तो खुशी हुई माँ, फेल हुआ समझाया माँ ने॥
कभी झूठ बोला तो मारा, केवल सच सिखलाया माँ ने।
शादी योग्य हुआ की शादी, इंसा मुझे बनाया माँ ने ॥
सास-बहू में तू-तू मैं-मैं हुई, हमेशा छुपाया माँ ने।
गाली खायी अश्क बहाए, फिर भी नहीं बताया माँ ने।
मैं तो कर्ज चुका ना पाया, मेरा कर्ज चुकाया माँ ने।
मरते दम तक दी आशीषें माँ ने, सदा नेह बरसाया माँ ने॥
जब भी मैं रोया चिल्लाया, छाती से चिपकाया माँ ने॥
घुटुअन चला गिरा पुचकारा, चोट लगी सहलाया माँ ने।
धीरे-धीरे बडा हुआ मैं, उँगली पकड चलाया माँ ने॥
भूखी रही बाद में खाया, पहले मुझे खिलाया माँ ने।
गीले में सोई महतारी, सूखे मुझे सुलाया माँ ने॥
नजर न लगे किसी की मुझको, टीका रोज लगाया माँ ने।
घर से बाहर जब भी निकला, सिर पर हाथ फिराया माँ ने।
पढने गया पाठशाला में, ले-ले कर्ज पढाया माँ ने।
पास हुआ तो खुशी हुई माँ, फेल हुआ समझाया माँ ने॥
कभी झूठ बोला तो मारा, केवल सच सिखलाया माँ ने।
शादी योग्य हुआ की शादी, इंसा मुझे बनाया माँ ने ॥
सास-बहू में तू-तू मैं-मैं हुई, हमेशा छुपाया माँ ने।
गाली खायी अश्क बहाए, फिर भी नहीं बताया माँ ने।
मैं तो कर्ज चुका ना पाया, मेरा कर्ज चुकाया माँ ने।
मरते दम तक दी आशीषें माँ ने, सदा नेह बरसाया माँ ने॥
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