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मंगलवार, 27 मार्च 2012

सीमित दायरा

महीनों हो गए

पडो‌स का मकान खाली है

कोई

रह भी रहा हो तो

पता नहीं

बंद दरवाजे

कहाँ बताते हैं

बगल में कौन रहता है

वे तो मूक हैं

इस तरह

कंक्रीट वाले जंगलों के बीच

महानगरों में रहने वालों की जिंदगी

दस-बाई-दस के कमरों से लेकर

चार-बाई छः की

कार तक ही सीमित है

जो

भागती रहती है

कोलतार की गर्म सड‌कों पर

या

बीतती है बंद कमरों में

इनके

दिन की शुरूआत होती है

ताला बंद करने से

और

खत्म होती है

देर रात को

ताला खोलने तक

बंद दरवाजे के भीतर

दम-घोंटू वातावरण

ताला खोलते ही

भयानक अंदाज में अहसास कराता है

अपने आपको

कैद से मुक्त कराने का

और

करता है

जानलेवा प्रयास

ताकि

कल तुम ऐसा न करो

फिर भी नहीं मानते

महानगरों में बसने वाले लोग

क्योंकि

सीमित हो चुका है उनका दायरा

और

वे इस दिनचर्या रूपी

नशे के आदी हो चुके हैं।

गुरुवार, 22 मार्च 2012

सान्निध्य: ऐ हुतात्माओ

सान्निध्य: ऐ हुतात्माओ: ऐ हुतात्माओ तुम्‍हें श्रद्धा से नमन् पर...!!! आज श्रद्धा के साथ साथ शर्म से भी झुके हैं सि‍र स्वतंत्रता के स्वप्न जो देखे थे तुमने वो कल की...

बुधवार, 14 मार्च 2012

सान्निध्य: शैफ़ाली

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बुधवार, 7 मार्च 2012

सान्निध्य: रंग भंग चंग का त्‍‍योहार है होली

सान्निध्य: रंग भंग चंग का त्‍‍योहार है होली: रंग भंग चंग का त्योहार है होली। रँगता गया जो इसमें होली उसकी तो हो ली।। लेके चंग टोली झूमो नाचो व गाओ। जि‍ससे मि‍लो तुम रंग लगा के अपना ब...

मंगलवार, 6 मार्च 2012

समाज

जब भी

होली का दिन आता है

वह भिखारी

बडा‌ खुश हो जाता है

क्योंकि

उसी दिन तो वह

फटे-पुराने कपडे‌ पहनकर

समाज में

गले मिल पाता है।

व्यवहार

होली पर हमें

उनका व्यवहार

बहुत भाता है

क्योंकि

हमारा खर्चा बच जाता है

और

रंग डालने के पहले ही

उनका चेहरा

गुस्से से लाल हो जाता है।

सोमवार, 5 मार्च 2012

सान्निध्य: होली पर कुण्‍डलि‍याँ

सान्निध्य: होली पर कुण्‍डलि‍याँ: होली की मस्ती में हो अबीर गुलाल का रंग। पानी में घुल कर रंग-रंग हो जाए ना बदरंग। जाए ना बदरंग रंग बेरंग लगे होली। काले दि‍ल वालों की काली ह...