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गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

मुक्तक

जिन्दगी और मौत का सच जान लेगा जो।
वक्त और इंसान को पहचान लेगा जो॥
जिन्दगी जीयेगा वो ही शान से 'गाफिल',
मौत से मिलने की मन में ठान लेगा जो॥


चाह कर भी जिन्दगी से मिल न पाये।
वक्त के भी साथ में हम चल न पाये॥
हमने जीवन भर छला है हर किसी को,
मौत से हारे उसे हम छल न पाये॥


हम पुजारी सत्य के है कर्म से नाता।
प्रेम और सौहार्द्र का जीना हमें भाता॥
वक्त से कह दो कि दे वो साथ सच का,
झूठ से मिलने कभी भी सच नहीं जाता॥


मौत से डर कर न जी वो एक दिन ही आयेगी।
जिन्दगी के सफर का संग आईना भी लायेगी॥
लाख करना मिन्नतें तेरी सुनेगी वो नहीं,
तू न जाना चाहेगा तो खींच कर ले जायेगी॥

मुक्तक

दिल में दर्द छुपाया हमने चेहरे पर मुस्कान रखी।
प्रथम मिलन में भी जीवन की हमने हर पहचान रखी॥
पुनर्मिलन की आस लिये हम मिले सभी से जीवन में,
विमुख हुये तो भी मर्यादा आन-बान और शान रखी॥


प्यार के हर रंग को स्वीकार कर देखो।
रंग नफरत का सदा दुत्कार कर देखो॥
जिन्दगी भर रंग की बरसात होगी,
प्यार से यदि प्यार का रंग डार कर देखो॥



जिन्दगी जीयो हमेशा मुस्कुराकर।
दर्द को भी देख लो अपना बनाकर॥
प्रेम से बढ़कर नहीं कुछ और जग में,
तोडना मत दिल किसी का दिल लगाकर॥

मंगलवार, 27 मार्च 2012

सदी के हत्यारे

नेता

अमानवीय कृत्यों की

पराकाष्ठा हो तुम

तुम्हारा

छल-छद्म देखकर

भेडियों ने आत्महत्या कर ली

तुम

बोलते नहीं

आग उगलते हो

तुम्हारा

मौन रहकर मंथन करना

निश्चित

विनाश का संकेत है

तुम्हारा

कौवे सा सयानापन

सबूत है

तुम्हारे काने होने का

बेवकूफ हैं वे

जो

करते हैं वर्ष भर इंतजार

नाग-पंचमी पर दूध पिलाने का

इसके अलावा भी

तीन सौ चौंसठ दिनों का

विकल्प है उनके पास

सच तो यह है

कि आज

गलतफहमी में जीता है समाज

क्योंकि

जो शांति के उपासक घोषित हैं

वे ही

इस सदी के हत्यारे हैं।

उम्मीदें क्यों ?

क्यों बिलोता हूँ कीचड़

शायद इसलिए

दूध की तरह

उफान न आए

क्यों लिखता हूँ

रेत पर अपने छंद

शायद इसलिए

कोई इतिहास बन जाए

क्यों देखता हूँ आईना

शायद इसलिए

चेहरे पर अपने

भरोसा नहीं

क्यों मौन हूँ

शायद इसलिए

वाणी चुर (चुराना) न जाए

क्यों रहता हूँ फटेहाल

सुदामा की तरह

शायद इसलिए

कृष्ण, मुझे भी अपनाएँ

क्यों है

सूरज से दोस्ती की लालसा

शायद इसलिए

रोशनी कहीं

अँधेरों में न सिमट जाए

क्यों लगाए हैं कैक्टस

शायद इसलिए

यमराज के आने का डर है

क्यों डर है रिश्तों से

शायद इसलिए

खून अपना

तुरूप की चाल न हो

यह सारी उम्मीदें क्यों

शायद इसलिए

असंभव

संभव हो जाए।

चटकनी

दरवाजे

हर रोज

अनगिनत बार

चौखट से गले मिलते हैं

साक्षी हैं कब्जे

इस बात के

जो

सौगंध खा चुके हैं

दोनों को मिलाते रहने की

जंग लगने पर

कमजोर हो जाते हैं कब्जे

और

चर्र-चर्र ......

आवाज करते हुए

कराहते हैं दर्द से

फिर भी

निःस्वार्थ भाव से

दोनों को मिलाते रहने का क्रम

जारी रखते हैं

जलते हैं तो

गिट्टक और स्टॉपर

मिलन के अवरोधक बनकर

कहने को अपने हैं

सहयोग करती है

हवा

अपनी सामर्थ्य के अनुसार

ललकारती भी है

गिट्टक और स्टॉपर को

और

चौखट से दरवाजे का

मिलन हो न हो

जारी रखती है प्रयास

उससे भी महान है

चटकनी

जो

ढूँढती है मौका

दोनों के प्रणय मिलन का

और

खुद बंद होकर

घंटों मिला देती है दोनों को।

सीमित दायरा

महीनों हो गए

पडो‌स का मकान खाली है

कोई

रह भी रहा हो तो

पता नहीं

बंद दरवाजे

कहाँ बताते हैं

बगल में कौन रहता है

वे तो मूक हैं

इस तरह

कंक्रीट वाले जंगलों के बीच

महानगरों में रहने वालों की जिंदगी

दस-बाई-दस के कमरों से लेकर

चार-बाई छः की

कार तक ही सीमित है

जो

भागती रहती है

कोलतार की गर्म सड‌कों पर

या

बीतती है बंद कमरों में

इनके

दिन की शुरूआत होती है

ताला बंद करने से

और

खत्म होती है

देर रात को

ताला खोलने तक

बंद दरवाजे के भीतर

दम-घोंटू वातावरण

ताला खोलते ही

भयानक अंदाज में अहसास कराता है

अपने आपको

कैद से मुक्त कराने का

और

करता है

जानलेवा प्रयास

ताकि

कल तुम ऐसा न करो

फिर भी नहीं मानते

महानगरों में बसने वाले लोग

क्योंकि

सीमित हो चुका है उनका दायरा

और

वे इस दिनचर्या रूपी

नशे के आदी हो चुके हैं।

गुरुवार, 22 मार्च 2012

सान्निध्य: ऐ हुतात्माओ

सान्निध्य: ऐ हुतात्माओ: ऐ हुतात्माओ तुम्‍हें श्रद्धा से नमन् पर...!!! आज श्रद्धा के साथ साथ शर्म से भी झुके हैं सि‍र स्वतंत्रता के स्वप्न जो देखे थे तुमने वो कल की...