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गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

हम

घर में आटा दाल नहीं है।
फिर भी मन कंगाल नहीं है॥

माँ माटी को नमन करें नित,
हम जैसा तो लाल नहीं है॥

हम मेहनत-इज्जत की खाते,
हम पर जुडता माल नहीं है॥

हम हैं सच्चे पथ के राही,
अपनी टेढी‌ चाल नहीं है।

हम पर दर्दो का है पहरा,
मद माया का जाल नहीं है॥

हम हैं प्रश्न हम ही हैं उत्तर,
हमसे बडा‌ सवाल नहीं है॥

सेवा और प्रेम में 'गाफिल',
बद है पर बदहाल नहीं है॥

मुक्तक

(१)
जो शहीद हो गये वतन पर वो कुछ ही अवतार हुये।
उनमें राजगुरू ऊधम और भगतसिंह सरदार हुये॥
निशदिन याद करें हम उनको नित उठ उनको करें नमन॥
जिनके कारण आजादी के स्वप्न सभी साकार हुये॥

(२)
वीर शहीदों की कुर्बानी भूले सुख पाने वाले।
अब तो केवल मौज ले रहे सत्ता में आने वाले॥
भ्रष्टाचार और घोटाले भारत की पहिचान बने,
देश बेच कर खा जायेंगे दुष्ट भ्रष्ट खाने वाले॥

(३)
धर्म कर्म और संस्कार अब नजर न आते।
भोग विलासी लोग हुये सब मजे उडा‌ते॥
मिट्टी में मिल गईं मान मर्यादायें अब,
पैसे प्यार में 'गाफिल' जीवन भर भरमाते॥

मुक्तक

जिन्दगी और मौत का सच जान लेगा जो।
वक्त और इंसान को पहचान लेगा जो॥
जिन्दगी जीयेगा वो ही शान से 'गाफिल',
मौत से मिलने की मन में ठान लेगा जो॥


चाह कर भी जिन्दगी से मिल न पाये।
वक्त के भी साथ में हम चल न पाये॥
हमने जीवन भर छला है हर किसी को,
मौत से हारे उसे हम छल न पाये॥


हम पुजारी सत्य के है कर्म से नाता।
प्रेम और सौहार्द्र का जीना हमें भाता॥
वक्त से कह दो कि दे वो साथ सच का,
झूठ से मिलने कभी भी सच नहीं जाता॥


मौत से डर कर न जी वो एक दिन ही आयेगी।
जिन्दगी के सफर का संग आईना भी लायेगी॥
लाख करना मिन्नतें तेरी सुनेगी वो नहीं,
तू न जाना चाहेगा तो खींच कर ले जायेगी॥

मुक्तक

दिल में दर्द छुपाया हमने चेहरे पर मुस्कान रखी।
प्रथम मिलन में भी जीवन की हमने हर पहचान रखी॥
पुनर्मिलन की आस लिये हम मिले सभी से जीवन में,
विमुख हुये तो भी मर्यादा आन-बान और शान रखी॥


प्यार के हर रंग को स्वीकार कर देखो।
रंग नफरत का सदा दुत्कार कर देखो॥
जिन्दगी भर रंग की बरसात होगी,
प्यार से यदि प्यार का रंग डार कर देखो॥



जिन्दगी जीयो हमेशा मुस्कुराकर।
दर्द को भी देख लो अपना बनाकर॥
प्रेम से बढ़कर नहीं कुछ और जग में,
तोडना मत दिल किसी का दिल लगाकर॥

मंगलवार, 27 मार्च 2012

सदी के हत्यारे

नेता

अमानवीय कृत्यों की

पराकाष्ठा हो तुम

तुम्हारा

छल-छद्म देखकर

भेडियों ने आत्महत्या कर ली

तुम

बोलते नहीं

आग उगलते हो

तुम्हारा

मौन रहकर मंथन करना

निश्चित

विनाश का संकेत है

तुम्हारा

कौवे सा सयानापन

सबूत है

तुम्हारे काने होने का

बेवकूफ हैं वे

जो

करते हैं वर्ष भर इंतजार

नाग-पंचमी पर दूध पिलाने का

इसके अलावा भी

तीन सौ चौंसठ दिनों का

विकल्प है उनके पास

सच तो यह है

कि आज

गलतफहमी में जीता है समाज

क्योंकि

जो शांति के उपासक घोषित हैं

वे ही

इस सदी के हत्यारे हैं।

उम्मीदें क्यों ?

क्यों बिलोता हूँ कीचड़

शायद इसलिए

दूध की तरह

उफान न आए

क्यों लिखता हूँ

रेत पर अपने छंद

शायद इसलिए

कोई इतिहास बन जाए

क्यों देखता हूँ आईना

शायद इसलिए

चेहरे पर अपने

भरोसा नहीं

क्यों मौन हूँ

शायद इसलिए

वाणी चुर (चुराना) न जाए

क्यों रहता हूँ फटेहाल

सुदामा की तरह

शायद इसलिए

कृष्ण, मुझे भी अपनाएँ

क्यों है

सूरज से दोस्ती की लालसा

शायद इसलिए

रोशनी कहीं

अँधेरों में न सिमट जाए

क्यों लगाए हैं कैक्टस

शायद इसलिए

यमराज के आने का डर है

क्यों डर है रिश्तों से

शायद इसलिए

खून अपना

तुरूप की चाल न हो

यह सारी उम्मीदें क्यों

शायद इसलिए

असंभव

संभव हो जाए।

चटकनी

दरवाजे

हर रोज

अनगिनत बार

चौखट से गले मिलते हैं

साक्षी हैं कब्जे

इस बात के

जो

सौगंध खा चुके हैं

दोनों को मिलाते रहने की

जंग लगने पर

कमजोर हो जाते हैं कब्जे

और

चर्र-चर्र ......

आवाज करते हुए

कराहते हैं दर्द से

फिर भी

निःस्वार्थ भाव से

दोनों को मिलाते रहने का क्रम

जारी रखते हैं

जलते हैं तो

गिट्टक और स्टॉपर

मिलन के अवरोधक बनकर

कहने को अपने हैं

सहयोग करती है

हवा

अपनी सामर्थ्य के अनुसार

ललकारती भी है

गिट्टक और स्टॉपर को

और

चौखट से दरवाजे का

मिलन हो न हो

जारी रखती है प्रयास

उससे भी महान है

चटकनी

जो

ढूँढती है मौका

दोनों के प्रणय मिलन का

और

खुद बंद होकर

घंटों मिला देती है दोनों को।