हमने अपनी माँ को देखा,
फिर मां में ममता को देखा।
ममता में भी मां को देखा,
बार बार बस मां को देखा।।
देखा-देखी के इस युग में,
हमने केवल मां को देखा।
माँ ने तो हमको भी देखा,
और सारे जग को भी देखा।।
जब मैं छोटा, माँ-माँ होती,
मैं रोता था माँ ना रोती।
मुझे खिला पिला कर भी माँ,
कभी-कभी भूखी भी सोती।।
आज उलट है उसका यारों,
अपनी मां अब वृद्ध हो गई।
बहू-बेटियां नाती-पोते,
घर की फौज समृद्ध हो गई।।
माँ की खटिया घर के बाहर,
या छप्पर के नीचे आई।
रोटी की तो बात अलग है,
पानी को भी देत दुहाई।।
बुढ़िया-बुढ़िया कहकर घर क्या,
सारा गांव बुलाता है।
बुढ़िया रोये या चिल्लाये,
बेटा भी कतराता है।।
बुढ़िया होकर भी माँ-माँ है,
फिर भी आंसू पी रह जाती।
घर में अगर कोई झगड़ा हो,
पास बुला सबको समझाती।।
माँ की हालत ऐसी भैया,
मेरी हो या तेरी मैया।
माँ का दुःख बस मां ही जाने,
या फिर जाने सृष्टि रचैया।।
माँ की सेवा परम धर्म है,
ये हैं संतों की बानी।
जीते जी कर माँ की सेवा,
माँ मरने के बाद न आनी।।
जो माँ के चरणों में अर्पण,
तन-मन धन कर जायेगा।
जीवन भर सुख पायेगा वो,
और स्वर्ग में जायेगा।।
सोमवार, 31 जनवरी 2011
माँ
कितना छोटा शब्द माँ, लेकिन बड़ा महान।
माँ के आगे लघु लगे, “गाफिल” सकल जहान।।
माँ से बड़ा न देवता, इस दुनिया में कोय।
माँ के आँचल में सभी, देव रहे हैं सोय।।
केवल जननी जानती, जननी माँ का दर्द।
जानेगा कैसे भला, माँ की पीड़ा मर्द।।
जिस घर ममता मात की, जिस घर मात दुलार।
“गाफिल” उस घर में बहे, जीवन की रस धार।।
माँ के ऋण से ना कभी, उऋण होगा पूत।
माँ की सेवा जो करे, सच्चा वही सपूत।।
नाती बेटा देखकर, फिर पन्ती की चाह।
ऐसी माँ की आत्मा, ऐसी माँ की राह।।
दुख सहकर भी माँ सदा, हंसे और मुस्काय।
मर कर भी माँ स्वर्ग से, सुख आशीष लुटाय।।
जब तक माँ जीवित रहे, सेवा करें न लोग।
मर जाने के बाद में रोज, लगावें भोग।।
“गाफिल” सुख गर चाहिये, निशदिन माँ को पूज।
तब होगी संसार में, तेरी जय औ’ बूझ।।
माँ के चरणों में सभी, तीरथ चारों धाम।
“गाफिल” माँ के चरण गहि, पूरन हों सब काम।।
जो माँ की सेवा करे, वही स्वर्ग में जाय।
बरना माँ के बाद में, जीवन भर पछिताय।।
माँ के आगे लघु लगे, “गाफिल” सकल जहान।।
माँ से बड़ा न देवता, इस दुनिया में कोय।
माँ के आँचल में सभी, देव रहे हैं सोय।।
केवल जननी जानती, जननी माँ का दर्द।
जानेगा कैसे भला, माँ की पीड़ा मर्द।।
जिस घर ममता मात की, जिस घर मात दुलार।
“गाफिल” उस घर में बहे, जीवन की रस धार।।
माँ के ऋण से ना कभी, उऋण होगा पूत।
माँ की सेवा जो करे, सच्चा वही सपूत।।
नाती बेटा देखकर, फिर पन्ती की चाह।
ऐसी माँ की आत्मा, ऐसी माँ की राह।।
दुख सहकर भी माँ सदा, हंसे और मुस्काय।
मर कर भी माँ स्वर्ग से, सुख आशीष लुटाय।।
जब तक माँ जीवित रहे, सेवा करें न लोग।
मर जाने के बाद में रोज, लगावें भोग।।
“गाफिल” सुख गर चाहिये, निशदिन माँ को पूज।
तब होगी संसार में, तेरी जय औ’ बूझ।।
माँ के चरणों में सभी, तीरथ चारों धाम।
“गाफिल” माँ के चरण गहि, पूरन हों सब काम।।
जो माँ की सेवा करे, वही स्वर्ग में जाय।
बरना माँ के बाद में, जीवन भर पछिताय।।
पी पी के सुरा
पी पी के सुरा जिन्दगी हमने बिगार ली।
कोई बता दे जिसने पीकर संवार ली।।
पीने को तरसते हैं दो घूँट गर मिले,
आई जो सामने तो बोतल डकार ली।।
पहिचान बढ़ गई है पी पी के इस कदर,
घर में खतम हो गई जाकर उधार ली।।
पीने का किसी को भी आया न सलीका,
पीने को समझते हैं कि जंग मार ली।।
दिल टोकता है हमको पीना नहीं कभी,
पी पी के हुये “गाफिल” तो बार बार ली।।
कोई बता दे जिसने पीकर संवार ली।।
पीने को तरसते हैं दो घूँट गर मिले,
आई जो सामने तो बोतल डकार ली।।
पहिचान बढ़ गई है पी पी के इस कदर,
घर में खतम हो गई जाकर उधार ली।।
पीने का किसी को भी आया न सलीका,
पीने को समझते हैं कि जंग मार ली।।
दिल टोकता है हमको पीना नहीं कभी,
पी पी के हुये “गाफिल” तो बार बार ली।।
चाँद तक पहुँचे
चाँद तक पहुंचे हमारे पांव यारो।
पर अंधेरों में अभी भी गांव यारो।।
दिन सुनहरा रात जिनकी चाँदनी है,
वे हमें दिखला रहे हैं छांव यारो।।
रंग गिरगिट की तरह जो नित बदलते,
वो भला क्या लायेंगे बदलाव यारो।।
क्या भरोसा हम करें उनकी जुबां का,
चल रहे हैं नित नये जो दाव यारों।।
है निराली दास्तां अपने वतन की,
खुद डुबो देते हैं नाविक नाव यारो।।
पर अंधेरों में अभी भी गांव यारो।।
दिन सुनहरा रात जिनकी चाँदनी है,
वे हमें दिखला रहे हैं छांव यारो।।
रंग गिरगिट की तरह जो नित बदलते,
वो भला क्या लायेंगे बदलाव यारो।।
क्या भरोसा हम करें उनकी जुबां का,
चल रहे हैं नित नये जो दाव यारों।।
है निराली दास्तां अपने वतन की,
खुद डुबो देते हैं नाविक नाव यारो।।
बहुत कुछ है...........
बहुत कुछ है वतन में, भर पेट खाने के लिये।
लोग फिर भी जा रहे, बाहर कमाने के लिये।।
कौन कहता है कमी है तेल की इस देश में,
मुफ्त में मिल जायेगा जलने जलाने के लिये।।
महल हैं गिरवी रखे हैं सोचना तू छोड़ दे,
झोंपड़ा अच्छा है तेरा सर छुपाने के लिये।।
मरने वाले मर रहे विस्फोट से हर मुल्क में,
फिर भी करार हो रहे हैं बम बनाने के लिये।।
है नहीं कोई किसी का सोच ले “गाफिल” जरा,
तैयार सब हैं सब को उल्लू बनाने के लिये।।
लोग फिर भी जा रहे, बाहर कमाने के लिये।।
कौन कहता है कमी है तेल की इस देश में,
मुफ्त में मिल जायेगा जलने जलाने के लिये।।
महल हैं गिरवी रखे हैं सोचना तू छोड़ दे,
झोंपड़ा अच्छा है तेरा सर छुपाने के लिये।।
मरने वाले मर रहे विस्फोट से हर मुल्क में,
फिर भी करार हो रहे हैं बम बनाने के लिये।।
है नहीं कोई किसी का सोच ले “गाफिल” जरा,
तैयार सब हैं सब को उल्लू बनाने के लिये।।
फर्क नहीं पड़ता है
इसकी हो सरकार, फर्क नहीं पड़ता है।
या उसकी सरकार, फर्क नहीं पड़ता है।।
बिना दाम के काम नहीं कुछ भी होता,
पहले दे जा यार, फर्क नहीं पड़ता है।।
अधिकारी आये या मंत्री डर कैसा,
सब पैसे के यार, फर्क नहीं पड़ता है।।
सुनता नहीं दीन की कोई दुनिया में,
चाहे मर या मार, फर्क नहीं पड़ता है।।
सभी भ्रष्ट हैं भ्रष्टाचार की जै बोलो,
सच की मिट्टी ख्वार, फर्क नहीं पड़ता है।।
लेने वाले मौज ले रहे तू भी ले,
मत कर सोच विचार, फर्क नहीं पड़ता है।।
झूँठों की दुनिया में शामिल हो “गाफिल” ,
वरना मर जा यार, फर्क नहीं पड़ता है।।
या उसकी सरकार, फर्क नहीं पड़ता है।।
बिना दाम के काम नहीं कुछ भी होता,
पहले दे जा यार, फर्क नहीं पड़ता है।।
अधिकारी आये या मंत्री डर कैसा,
सब पैसे के यार, फर्क नहीं पड़ता है।।
सुनता नहीं दीन की कोई दुनिया में,
चाहे मर या मार, फर्क नहीं पड़ता है।।
सभी भ्रष्ट हैं भ्रष्टाचार की जै बोलो,
सच की मिट्टी ख्वार, फर्क नहीं पड़ता है।।
लेने वाले मौज ले रहे तू भी ले,
मत कर सोच विचार, फर्क नहीं पड़ता है।।
झूँठों की दुनिया में शामिल हो “गाफिल” ,
वरना मर जा यार, फर्क नहीं पड़ता है।।
कलयुगी दोहे
दौर कलयुगी चल रहा, बदले सब हालात।
दुनिया झूठी हो गई, झूठी सच की बात।।
सच्चा सुख गायब हुआ, हावी झूठी शान।
चमद-दमक में खो गई, जीवन की पहिचान।।
सच्चाई अनमोल है, ये कहने की बात।
झूठ कीमती हो गया, झूठ चले दिन-रात।।
“गाफिल” सुख की खोज में, हुई दुःखों की खोज।
जीवन चिथड़े हो रहे, गोली बम से रोज।।
भौतिकवादी हो गया, “गाफिल” हर इंसान।
सब मस्ती में मस्त हैं, धन का है सम्मान।।
नैतिकता कुम्हला गई, हावी है उत्पात।
बेटे और बहून से, दुःखी पिता अरू मात।।
कलियुग की महिमा अजब, अजब कलियुगी खेल।
भाई-भाई में नहीं, रहा प्रेम अरू मेल।।
अपने ही देने लगे, अब अपनों को कष्ट।
आज सभ्यता देश की, हुई पतित - पथ भ्रष्ट।।
बहू डांटती सास को, करती रोज कलेष।
कलयुग की हर नारि के, मन माही छल-द्वेष।।
स्वारथ में हर आदमी, अंधा अरू हैवान।
भाई - भाई का कतल, कर देता इंसान ।।
राम - श्याम के देश में, “गाफिल” भ्रष्ट नरेश।
भ्रष्टों की अब मौज है, सच्चे दुःखी हमेश।।
बैठ सुरग में देव सब, सोचें बस ये बात।
“गाफिल” धरती पर मचा, कोहराम उत्पात।।
दुष्टों - भ्रष्टों से सभी, देव दुःखी लाचार।
इसीलिये लेते नहीं, कलयुग में अवतार।।
बम्ब कहीं गोली कहीं, लुटे कहीं पर लाज।
राम भरोसे जिन्दगी, जीते हैं सब आज।।
सीता - सीता ना रही, राम रहे ना राम।
बुरे काम से ना डरें, अब के राधाश्याम।।
रहा नहीं अब शुद्ध कुछ, इस दुनिया में यार।
नम्बर देश के हो गये, सारे कारोबार।।
जीवन यौवन चार दिन, नश्वर ये संसार।
इसीलिये सब ले रहे, निशदिन मौज बहार।।
जायेगा ना साथ कुछ, सभी जानते लोग।
फिर भी धन की चाह का, लगा सभी को रोग।।
मरना सब को एक दिन, सब जानें ये बात।
फिर भी खोटे काम में, सभी लिप्त दिन-रात।।
“गाफिल” सारे लोग अब, मद माया में चूर।
व्यस्त मस्त हैं रात-दिन, हुये प्रभू से दूर।।
झूठ बोलने का बढ़ा, फैशन और रिवाज।
मोबाइल ने कर दिया, सबको झूठा आज।।
गांवन में भी सर चढ़ी, फैशन सौ परसेन्ट।
बूढ़े क्या अब लड़कियां, पहिनें टीशर्ट-पेन्ट।।
कलयुग का गुरू मंत्र है, दम दारू अरू दाम।
इनके बिना न होयेगा, कोई पूरन काम।।
देख - देख हैरान है, दुनिया को भगवान।
भले लोग सब हैं दुःखी, खुश हैं बेईमान।।
दुनिया झूठी हो गई, झूठी सच की बात।।
सच्चा सुख गायब हुआ, हावी झूठी शान।
चमद-दमक में खो गई, जीवन की पहिचान।।
सच्चाई अनमोल है, ये कहने की बात।
झूठ कीमती हो गया, झूठ चले दिन-रात।।
“गाफिल” सुख की खोज में, हुई दुःखों की खोज।
जीवन चिथड़े हो रहे, गोली बम से रोज।।
भौतिकवादी हो गया, “गाफिल” हर इंसान।
सब मस्ती में मस्त हैं, धन का है सम्मान।।
नैतिकता कुम्हला गई, हावी है उत्पात।
बेटे और बहून से, दुःखी पिता अरू मात।।
कलियुग की महिमा अजब, अजब कलियुगी खेल।
भाई-भाई में नहीं, रहा प्रेम अरू मेल।।
अपने ही देने लगे, अब अपनों को कष्ट।
आज सभ्यता देश की, हुई पतित - पथ भ्रष्ट।।
बहू डांटती सास को, करती रोज कलेष।
कलयुग की हर नारि के, मन माही छल-द्वेष।।
स्वारथ में हर आदमी, अंधा अरू हैवान।
भाई - भाई का कतल, कर देता इंसान ।।
राम - श्याम के देश में, “गाफिल” भ्रष्ट नरेश।
भ्रष्टों की अब मौज है, सच्चे दुःखी हमेश।।
बैठ सुरग में देव सब, सोचें बस ये बात।
“गाफिल” धरती पर मचा, कोहराम उत्पात।।
दुष्टों - भ्रष्टों से सभी, देव दुःखी लाचार।
इसीलिये लेते नहीं, कलयुग में अवतार।।
बम्ब कहीं गोली कहीं, लुटे कहीं पर लाज।
राम भरोसे जिन्दगी, जीते हैं सब आज।।
सीता - सीता ना रही, राम रहे ना राम।
बुरे काम से ना डरें, अब के राधाश्याम।।
रहा नहीं अब शुद्ध कुछ, इस दुनिया में यार।
नम्बर देश के हो गये, सारे कारोबार।।
जीवन यौवन चार दिन, नश्वर ये संसार।
इसीलिये सब ले रहे, निशदिन मौज बहार।।
जायेगा ना साथ कुछ, सभी जानते लोग।
फिर भी धन की चाह का, लगा सभी को रोग।।
मरना सब को एक दिन, सब जानें ये बात।
फिर भी खोटे काम में, सभी लिप्त दिन-रात।।
“गाफिल” सारे लोग अब, मद माया में चूर।
व्यस्त मस्त हैं रात-दिन, हुये प्रभू से दूर।।
झूठ बोलने का बढ़ा, फैशन और रिवाज।
मोबाइल ने कर दिया, सबको झूठा आज।।
गांवन में भी सर चढ़ी, फैशन सौ परसेन्ट।
बूढ़े क्या अब लड़कियां, पहिनें टीशर्ट-पेन्ट।।
कलयुग का गुरू मंत्र है, दम दारू अरू दाम।
इनके बिना न होयेगा, कोई पूरन काम।।
देख - देख हैरान है, दुनिया को भगवान।
भले लोग सब हैं दुःखी, खुश हैं बेईमान।।
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