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सोमवार, 31 जनवरी 2011

कलयुगी दोहे

दौर कलयुगी चल रहा, बदले सब हालात।
दुनिया झूठी हो गई, झूठी सच की बात।।

सच्चा सुख गायब हुआ, हावी झूठी शान।
चमद-दमक में खो गई, जीवन की पहिचान।।

सच्चाई अनमोल है, ये कहने की बात।
झूठ कीमती हो गया, झूठ चले दिन-रात।।

“गाफिल” सुख की खोज में, हुई दुःखों की खोज।
जीवन चिथड़े हो रहे, गोली बम से रोज।।

भौतिकवादी हो गया, “गाफिल” हर इंसान।
सब मस्ती में मस्त हैं, धन का है सम्मान।।

नैतिकता कुम्हला गई, हावी है उत्पात।
बेटे और बहून से, दुःखी पिता अरू मात।।

कलियुग की महिमा अजब, अजब कलियुगी खेल।
भाई-भाई में नहीं, रहा प्रेम अरू मेल।।

अपने ही देने लगे, अब अपनों को कष्ट।
आज सभ्यता देश की, हुई पतित - पथ भ्रष्ट।।

बहू डांटती सास को, करती रोज कलेष।
कलयुग की हर नारि के, मन माही छल-द्वेष।।

स्वारथ में हर आदमी, अंधा अरू हैवान।
भाई - भाई का कतल, कर देता इंसान ।।

राम - श्याम के देश में, “गाफिल” भ्रष्ट नरेश।
भ्रष्टों की अब मौज है, सच्चे दुःखी हमेश।।

बैठ सुरग में देव सब, सोचें बस ये बात।
“गाफिल” धरती पर मचा, कोहराम उत्पात।।

दुष्टों - भ्रष्टों से सभी, देव दुःखी लाचार।
इसीलिये लेते नहीं, कलयुग में अवतार।।

बम्ब कहीं गोली कहीं, लुटे कहीं पर लाज।
राम भरोसे जिन्दगी, जीते हैं सब आज।।

सीता - सीता ना रही, राम रहे ना राम।
बुरे काम से ना डरें, अब के राधाश्याम।।

रहा नहीं अब शुद्ध कुछ, इस दुनिया में यार।
नम्बर देश के हो गये, सारे कारोबार।।

जीवन यौवन चार दिन, नश्वर ये संसार।
इसीलिये सब ले रहे, निशदिन मौज बहार।।

जायेगा ना साथ कुछ, सभी जानते लोग।
फिर भी धन की चाह का, लगा सभी को रोग।।

मरना सब को एक दिन, सब जानें ये बात।
फिर भी खोटे काम में, सभी लिप्त दिन-रात।।

“गाफिल” सारे लोग अब, मद माया में चूर।
व्यस्त मस्त हैं रात-दिन, हुये प्रभू से दूर।।

झूठ बोलने का बढ़ा, फैशन और रिवाज।
मोबाइल ने कर दिया, सबको झूठा आज।।

गांवन में भी सर चढ़ी, फैशन सौ परसेन्ट।
बूढ़े क्या अब लड़कियां, पहिनें टीशर्ट-पेन्ट।।

कलयुग का गुरू मंत्र है, दम दारू अरू दाम।
इनके बिना न होयेगा, कोई पूरन काम।।

देख - देख हैरान है, दुनिया को भगवान।
भले लोग सब हैं दुःखी, खुश हैं बेईमान।।

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