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गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

मन का दीपक

जब मन का दीपक जला नहीं,
तो कोटि दीप जलने से क्या|
हिय पाप बसा मुख प्यार रहा,
तो ऐसे भी मिलने से क्या||

अन्तर घुल चुका दीवाली का,
बाहर फीका उजियाला है।
देखा-देखी तो जन-गन-मन,
है सुखी मगर मन काला है।।

मन तो रोता है जीवन भर,
सोचो क्षण भर हँसने से क्या|
जब मन का दीपक जला नहीं,
तो कोटि दीप जलने से क्या||

रोते तो देखे बहुतेरे,
हँसते बिरले देखे हमने।
सुख मिला तो हम अनजान हुये,
दुःख देख लगे रोने-भगने।।

ऐसे नर भार बने भू पर,
कुछ कर न सकें जीने से क्या|
जब मन का दीपक जला नहीं,
तो कोटि दीप जलने से क्या||

जिसका मन टूट गया हो वो,
समझो तन से भी टूट गया।
तन-मन जब टूट गया जिसका,
उसका जग-जीवन छूट गया।।

जो फूल महकता नहीं कभी,
उसके मिथ्या खिलने से क्या|
जब मन का दीपक जला नहीं,
तो कोटि दीप जलने से क्या||

क्या तुमने सोचा है कभी

(1)
क्या तुमने सोचा है कभी,
इस मिट्टी में जन्में औ’ पले,
इंसान हैं ऐसे भी लाखों,
जो भूखे ही सो जाते हैं।
शीत लहर में भी तरू नीचे,
फुटपाथों पर पड़े-पड़े,
भाग्य विधा ही समझ, जिन्दगी-
के दिन रात बिताते हैं।।

(2)
क्या तुमने सोचा है कभी,
अपने ही बच्चे जैसे वो,
भीख मांगते, घर-होटल में-
जे बर्तन धोया करते हैं।
मजबूरी में पढ़ने लिखने,
और खेलने के मृदु क्षण भी,
दुर्व्यसनों में पड़कर खोकर,
जीवन भर रोया करते हैं।।

(3)
क्या तुमने सोचा है कभी,
माँ बेटी और बहिन जैसी,
हैं असहाय बेचारी अबला,
बेचा करतीं जो निज तन को,
है दुर्भाग्य देश का अपना,
लाखों रावण दुशासन हैं,
अब तो राम-कृष्ण भी ऐसे,
हर लें तन-मन और वसन को।।

(4)

क्या तुमने सोचा है कभी,
जो श्रृद्धा भाव की थी मूरत,
है विकृत रूप उस नारी का,
चर्चा है घर बाजारों में।
ये कैसा घोर अनर्थ आज,
हैं घृणित अंग-प्यार दर्शन,
लाचार और आनंदित सब,
उलझे चैनल अखवारों में।।

(5)

क्या तुमने सोचा है कभी,
हम पापी और अधर्मी हैं,
सहते हैं अर्थ-अनर्थ सभी,
हम मूक बधिर अंधे बन कर।
भूले हम धर्म कर्म को ही,
माहौल प्रदूशित किया स्वयं,
बस एक समर्थ है प्रभु तू ही,
कुछ कर ‘गाफिल’ का दुःख सुनकर।।

अंतर्व्यथा

अन्तर्मन में धधके ज्वाला,
बाहर है मृत्यु का तांडव।
कौरव का गौरव विकसित है,
कुंठित हैं बेचारे पांडव।।
गीता के उपदेश सिसकते,
बंसी बजती नहीं श्याम की।
धूमिल है संस्कृति देश की,
मर्यादा रो रही राम की ।।
कितनी सीताओं के निश दिन,
होते हैं अपहरण यहाँ।
नहीं सुनिश्चित विजय राम की,
रावण का अब मरण कहाँ।।
आज कुँआरी बाला गर्भित,
हुआ देश का चरित पतन।
लाज द्रोपदी की न बचेगी,
हर कोई है दुशासन।।
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारों में,
आना-जाना नाम का है।
हाला प्याला औ’ सुरबाला,
मतलब यही दाम का है।।
झोंपड़ियों से महलों तक,
घनघोर अँधेरा फैला है।
कुँठित हैं सब ज्ञान रश्मियां,
सूरज भी मटमैला है।।
आज जरूरत सारे जग को,
सच की राह दिखाने की।
ऊपर वाले कर कुछ ऐसा,
आये समझ जमाने की।।

जग-जननी नारी

धन्य-धन्य जग-जननी नारी,
नमन तुम्हें है बारंबार।
नाम काम सब धन्य तुम्हारे,
नग्न प्रदर्शन को धिक्कार।।
वंदनीय ओ रूप स्वरूपा,
विकृत हुआ क्यों तेरा चेहरा।
चल कर देखो जरा सुपथ पर,
जीवन होगा बड़ा सुनहरा।।
आज किसी भी नारी को,
अबला कहना है नादानी।
नारी है अब सबला उसकी,
शक्ति सबने पहिचानी।।
हिन्द देश का नारी ने,
दुनिया में मान बढ़ाया है।
नारी को सम्मान सदा दो,
सब उसकी ही माया है।।
नारी माँ है नारी बेटी,
बहिन और महतारी वो।
नारी सबकी रही चहेती,
नर से ज्यादा भारी वो।।
नारी जग जननी है, ये सच-
कैसे तुम झुठलाओगे।
नारी को दुःख देकर मित्रो,
सुखी नहीं रह पाओगे।।

होली के रंग

फागुन के महीने का, नाम रंगीला है।
भौजी और देवर का, पैगाम रंगीला है।।
बृजधाम में होरी के, रंगों की छटा न्यारी;
राधा भी रंगी रंग में, घनश्याम रंगीला है।।
फागुन का महीना है, रंगीला है मौसम।
दिन रात रंगीले हैं, रंगों में है सरगम।।
रंगों में रंगी राधा, श्याम रंगे रंग में;
देवर और भौजी के, है प्यार के रंग में दम।।
होरी में दिवरिया पै, भौजी रंग डारि गई।
सूरत कूँ रंग औ‘ गुलाल सौं बिगारि गई।।
पीछे वारी होली की, कसकहू निकारि गई;
नैनन सौं बैनन कौ काम लै दुलारि गई।।
होरी में भौजी नै ऐसौ रंग डारयौ है।
तन कूँ बिगारयो जानै मन कूँ बिगारयो है।।
गालन गुलाल मलि, प्यार सौं दुलारयो है;
नैनन के बार सौं, बार बार मारयो है।।

गाफिल की सीख

जीवन यौवन चार दिन, नश्वर ये संसार ।

“गाफिल” हरि से हेत कर, गर चाहे उद्धार।।

छोड़ो धन की लालसा, रूके न धन इक ठौर।

तुझ पर है धन आज जो, कल्ल कहीं वो और।।

माया मन रूकते नहीं, चलते ये दिनरात।

तज माया को मन लगा, कुछ पल हरि के साथ।।

तन को धो उजला करें, दिन में सौ-सौ बार।

“गाफिल” मन को धो जरा, जामें सकल विकार।।

धोने से तन वसन को, चैन मिले इक बार ।

मन को धो कर देख ले, जीवन भर सुख यार।।

कुदरत करती काम निज, तू भी कर निज काम।

पर ईश्वर को भूल मत, जिसका जगत गुलाम।।

चोर भिखारी शाह या, बुरा भला शैतान।

सबके दाता हैं प्रभू, कर उनका गुणगान।।

दुःख के बदले दुःख मिले , सुख के बदले सुक्ख।

“गाफिल” अच्छे काम कर, मिट जायें सब दुक्ख।।

शिष्ट भक्त औ‘ संत जन, दुनिया में हैं चंद।

जिनके दर्शन मात्र से, मिले परम आनंद।।

जाते हैं सब स्वर्ग में, ‘गाफिल‘ मर कर लोग।

स्वीकारे कोई नहीं, नरकवास का योग।।

मन में लो संकल्प तुम, चलो सत्य की राह।

पूरी होगी एक दिन, जीवन की हर चाह।।

माया सुख-दुःख दारिणी, मोह विपति का जाल।

मद की अंधी चाल है, ‘गाफिल’ करो खयाल।।

बृज की होली

होली है बृज धाम की, दुनिया में मशहूर।

गली गली रंग रास हैं, रंग रसिया रंग हूर।।

बरसाने में रंग हैं, गोकुल में है रंग।

वृंदावन नंदगांव में, छिड़ी रंग की जंग।।

बृज में राधा श्याम के, रंगों की बरसात।

जमुना जल के रंग में, जीवन कौ रंग साथ।।

सभी सखी हैं राधिका, सभी सखा घनश्याम।

होली के रंग में रंग्यौ, पूरौ ही बृजधाम।।

श्याम रंग में तन रंग्यौ, मन राधा के रंग।

पंड़ा पी-पी मस्त हैं, भोले जी की भंग।।

पूरे ही बृजधाम में, रंग बरसे दिनरात।

“गाफिल” बृज के रंग की, रंग रंगीली बात।।

बृज -रज के रंग जो रंगे, बड़भागी वो लोग।

बृज-दर्शन के रंग सौं, मिट जायें सब रोग।।